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जेरुसलम पर संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव के मसौदे पर वीटो के बाद मतदान का स्पष्टीकरण

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राजदूत निकी हेली
संयुक्तराष्ट्र में अमेरिका की स्थायी प्रतिनिधि
संयुक्तराष्ट्र में अमेरिकी मिशन
न्यूयॉर्क सिटी
दिसंबर 18, 2017
जैसा बोला गया

 

 

धन्यवाद, सभापति महोदय।

मैं संयुक्तराष्ट्र संघ में अब करीब एक साल से अमेरिका की गौरवान्वित प्रतिनिधि हूं। यह पहला मौका है जब मैंने सुरक्षा परिषद में किसी प्रस्ताव को वीटो करने के अमेरिका के अधिकार का उपयोग किया है। वीटो का उपयोग ऐसा काम नहीं है जो अमेरिका अक्सर करता है। हमने छह साल से अधिक समय तक ऐसा नहीं किया है। हम ऐसा खुशी से नहीं करते, पर हम ऐसा अनिच्छा से भी नहीं करते।

यह तथ्य कि यह वीटो अमेरिकी संप्रभुता की रक्षा में और मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया में अमेरिका की भूमिका के बचाव में इस्तेमाल हुआ है, हमारे लिए शर्मिंदगी की कोई बात नहीं है; यह सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों के लिए शर्मिंदगी की बात होनी चाहिए।

जैसा कि मैंने 10 दिनों पहले इस विषय पर चर्चा के दौरान कहा था, मैं एक बार फिर जेरुसलम पर राष्ट्रपति की घोषणा के उन बिंदुओं का ज़िक्र करूंगी जो कि यहां सर्वाधिक प्रासंगिक हैं। राष्ट्रपति ने बहुत सावधानी बरती कि वह जेरुसलम में इजरायली संप्रभुता की विशिष्ट सीमाओं के मुद्दे समेत अंतिम स्थिति वार्ता को लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं दिखाएं। यह संबंधित पक्षों के बीच बातचीत द्वारा निर्धारित होने वाला विषय है। यह स्थिति पूरी तरह सुरक्षा परिषद के पूर्व प्रस्तावों के अनुरूप है।

राष्ट्रपति यह कहते हुए भी सतर्क थे कि हम जेरुसलम के पवित्र स्थलों के बारे में यथास्थिति का समर्थन करते हैं, और हम एक द्विराष्ट्र समाधान का समर्थन करते हैं यदि संबंधित पक्ष उस पर रज़ामंद होते हैं। एक बार फिर, ये बातें सुरक्षा परिषद के पूर्व के प्रस्तावों के पूरी तरह अनुरूप हैं।

यह बेहद खेदजनक है कि कुछ लोग अपने एजेंडे के खातिर राष्ट्रपति की बात को तोड़ने-मरोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

कुछ लोगों की परेशानी ये नहीं है कि अमेरिका ने शांति प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाया है – हमने, वास्तव में, ऐसा कुछ नहीं किया है। बजाय इसके, कुछ लोगों के लिए परेशानी का सबब ये है कि अमेरिका ने एक बुनियादी सच्चाई को स्वीकार करने की ईमानदारी और साहस दिखाया है। जेरुसलम हज़ारों वर्षों से यहूदी लोगों का राजनीतिक, सांस्कृतिक, और आध्यात्मिक होमलैंड रहा है। उनकी कोई और राजधानी नहीं रही है। लेकिन अमेरिका का हकीकत को स्वीकार करना – कि जेरुसलम आधुनिक इजरायली सरकार का केंद्र और राजधानी है – कुछ लोगों के लिए बहुत ज़्यादा है।

पहले, कुछ लोगों ने सड़कों पर हिंसा की धमकी दी, मानो हिंसा किसी भी तरह शांति की संभावनाओं को बढ़ा देगी।

और आज, कूटनीतिक शब्दजाल में लपेटकर, कुछ लोग अमेरिका को बता रहे हैं कि हम अपना दूतावास कहां रखें। अमेरिका को यह तय करने का संप्रभु अधिकार है कि हम अपना दूतावास कहां और कैसे स्थापित करें। मैं समझती हूं बहुत कम सदस्य देश अपने संप्रभु फैसलों के बारे में सुरक्षा परिषद की घोषणाओं का स्वागत करेंगे। और मैं कुछ के बारे में जानती हूं जिन्हें इसका डर होना चाहिए।

यह बात गौर करने की है कि यह कोई नई अमेरिकी स्थिति नहीं है। 1980 में, जब जिमी कार्टर अमेरिकी राष्ट्रपति थे, सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 478 पर मतदान किया, जिसमें राजनयिक मिशनों को जेरुसलम से हटाने की मांग की गई थी। अमेरिका ने प्रस्ताव 478 का समर्थन नहीं किया था।

अपनी टिप्पणी में, तत्कालनी विदेश मंत्री एड मस्की ने ये कहा था: “हमारे सामने मौजूद प्रस्ताव का मसौदा उस मानसिक व्यस्तता का उदाहरण है जिसने मध्य पूर्व के मुद्दों पर ऐसे असंतुलित और अवास्तविक दस्तावेज़ों को तैयार किया है।”

खास तौर पर, जेरुसलम में राजनयिक मिशनों के प्रावधान के बारे में, विदेश मंत्री मस्की ने ये कहा: “हमारे अनुसार, यह प्रावधान बाध्यकारी नहीं है। यह बिना बल के है। और हम इसे अन्य राष्ट्रों को निर्देश देने के बाधाकारी प्रयास के रूप में खारिज करते हैं। यह इजरायल और उसके पड़ोसियों के समक्ष मौजूद कठिन समस्याओं का समधान ढूंढने के बारे में कुछ नहीं करता। यह शांति कार्य को आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं करता।”

यह 1980 की बात थी। यह आज भी उतनी ही सत्य है। अमेरिका को कोई अन्य देश ये नहीं कह सकता कि हम अपना दूतावास कहां स्थापित करें।

इस प्रस्ताव के शब्दजाल के और भी भीतर एक आरोप है कि अमेरिका मध्य पूर्व में शांति की संभावनाओं को पीछे धकेल रहा है। यह एक शर्मनाक आरोप है। जो यह आरोप लगा रहे हैं, उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि इससे उन फलस्तीनी लोगों का ही नुकसान हो रहा है जिनके लिए आवाज़ उठाने का वो दावा करते हैं। बातचीत की राह में अवरोध खड़ा करने वाले अपने नेताओं से फलस्तीनी लोगों को क्या मिलता है?

एक “शांति प्रक्रिया” जिसका इस साधारण मान्यता से नुकसान हो गया कि जेरुसलम इजरायल की राजधानी है, शांति प्रक्रिया नहीं है; यह अंतहीन गतिरोध का एक बहाना है। फलस्तीनी लोगों को अपने कुछ नेताओं द्वारा अमेरिका पर शांति का दुश्मन होने का आरोप लगाने से क्या मिलता है? इससे उन्हें कुछ नहीं हासिल होता, पर यह उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाने का खतरा बनाता है।

फलस्तीनी लोगों की सहायता के लिए अमेरिका ने किसी भी देश से ज़्यादा काम किया है। अभी तक। 1994 से लेकर, हमने द्विपक्षीय आर्थिक सहायता, सुरक्षा सहायता, और मानवीय सहायता के रूप में फलस्तीनियों को करीब 5 अरब डॉलर दिए हैं।

फलस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्तराष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) पूरे क्षेत्र में स्कूल और चिकित्सा केंद्र संचालित करती है। यह लगभग पूरी तरह स्वैच्छिक योगदान से संचालित है। गत वर्ष, अमेरिका ने स्वेच्छा से UNRWA के बजट में करीब 30 प्रतिशत का योगदान किया। यह अगले दो बड़े दानदाताओं के सम्मिलित दान से भी ज़्यादा है। और यह इस परिषद के कुछ सदस्यों के मुकाबले बहुत ही ज़्यादा है जिनके खुद के अच्छे-खासे वित्तीय संसाधन हैं।

मैं खुल कर बोलती हूं: जब अमेरिकी जनता देखती है कि देशों का एक समूह जिनका फलस्तीनी लोगों के लिए कुल योगदान UNRWA के बजट के एक प्रतिशत से भी कम है – वे जब ऐसे देशों को अमेरिका पर शांति के प्रति अपर्याप्त वचनबद्धता का आरोप लगाते देखते हैं – अमेरिकी जनता अपना धैर्य खो देती है।

मैं फलस्तीनी शरणार्थी शिविरों में गई हूं जिन्हें कि अमेरिका अपने योगदान से सहारा देता है। मैं पुरुषों, महिलाओं और बच्चों से मिली हूं। मैंने उनकी हिमायत में आवाज़ उठाई है। मैं आपको बता सकती हूं कि उनके नेता शांति वार्ताओं की सफलता के लिए कड़ी मेहनत करने के मुकाबले वार्ताओं से अलग हटने को लेकर ज्यादा उत्साहित दिखकर उनका भला नहीं करते।

अमेरिका मध्य पूर्व में शांति के लिए इससे ज्यादा प्रतिबद्ध नहीं रहा है। हम जेरुसलम को इजरायल की राजधानी मानने की राष्ट्रपति की घोषणा से पहले से इसके लिए प्रतिबद्ध रहे हैं, और हम आज भी इसके लिए प्रतिबद्ध हैं।

सुरक्षा परिषद में आज हमने जो देखा वो अपमानजनक है। इसे भूला नहीं जाएगा। यह इस बात का एक और उदाहरण है कि संयुक्तराष्ट्र इजरायली-फलस्तीनी संघर्ष के संबंध में फायदे से अधिक नुकसान कर रहा है।

आज, अपना दूतावास कहां रखें सिर्फ यह तय करने के सामान्य कदम के कारण, अमेरिका को अपनी संप्रभुता का बचाव करना पड़ा। रिकॉर्ड इस बात की गवाही देगा कि हमने ऐसा गर्व के साथ किया। आज, इजरायल की राजधानी के बारे में एक बुनियादी सच को स्वीकार करने के कारण, हम पर शांति को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगे हैं। रिकॉर्ड इस बात की गवाही देगा कि हम इस अपमानजनक दावे को खारिज करते हैं।

इन कारणों से, और इजरायलियों और फलस्तीनियों दोनों के हितों का गंभीरता से ध्यान रखते हुए, अमेरिका इस प्रस्ताव पर नहीं का मतदान करता है।

धन्यवाद।


मूल सामग्री देखें: https://usun.state.gov/remarks/8222
यह अनुवाद एक शिष्टाचार के रूप में प्रदान किया गया है और केवल मूल अंग्रेजी स्रोत को ही आधिकारिक माना जाना चाहिए।
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