rss

हेरिटेज फाउंडेशन में “अमेरिका की मानवाधिकार परिषद से वापसी: प्रभाव और अगले कदम” विषय पर संबोधन

Русский Русский, English English, العربية العربية, Français Français, Português Português, Español Español, اردو اردو

राजदूत निकी हेली
संयुक्तराष्ट्र में अमेरिका की स्थायी प्रतिनिधि
संयुक्तराष्ट्र में अमेरिकी मिशन
वाशिंग्टन, डीसी
जुलाई 18, 2018

 

बहुत-बहुत धन्यवाद।

बहुत शुक्रिया, के। और हेरिटेज फाउंडेशन का धन्यवाद। यहां वापस आकर अच्छा लगता है, और मैं आपका धन्यवाद करती हूं इन कक्षों में होने वाले कार्य के लिए।

मैंने अपना पूरा सार्वजनिक जीवन अपनी आवाज़ का इस्तेमाल कार्रवाई के लिए दबाव बनाने – और ऐसा ही करने में दूसरों की मदद करने में बिताया है। मैं शुरुआती दिनों में ही जान गई थी कि बैठे रहने और चुप रहने में मैं अच्छी नहीं हूं। यदि लोगों का जीवन बेहतर करने के लिए कोई बात कही जानी है और कोई काम किया जाना है, तो हमें कोई राय बनानी पड़ेगी। और मैं पूरी ज़िंदगी ऐसा ही करती रही हूं।

संयुक्तराष्ट्र में पिछले 18 महीनों के दौरान, अपनी आवाज़ की शक्ति का इस्तेमाल करने की प्रेरणा मैंने अपने एक पूर्ववर्ती से ली। जीन कर्कपैट्रिक ने एक बार कहा था, “भाषण कार्रवाई है – और महत्वपूर्ण कार्रवाई।” उन्होंने संयुक्तराष्ट्र में अपने समकक्ष प्रतिनिधियों से टकराव मोल नहीं लिया, पर जब भी अमेरिकी मूल्यों एवं हितों पर खतरा दिखा वह अपनी बात कहने और अपने रुख पर अड़े रहने में नहीं हिचकिचाई। इसके चलते अनेकों बार राजदूत कर्कपैट्रिक ने, अमेरिका के हित में अपनाए रुख के कारण, खुद को लगभग अकेला पाया – कई बार, बिल्कुल अकेला।

इस भूमिका में 18 महीने गुजारने के बाद, मैं आपसे कह सकती हूं कि मैं उनकी पीड़ा को महसूस करती हूं।

संयुक्तराष्ट्र की स्थापना एक महान उद्देश्य से की गई थी – न्याय, समान अधिकार और लोगों के आत्मनिर्णय पर आधारित शांति एवं सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए। पर इसके कई सदस्य देश ऐसे हैं जिनके नेता इस उद्देश्य को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं। जब ऐसा होता है, अनेक नेकनीयत देश इन राष्ट्रों के साथ किसी समझौते तक पहुंचने की उम्मीद में तटस्थता की नीति अपना लेते हैं।

वे वास्तव में तानाशाही और अधिकारवादी शासनों को एजेंडा नियंत्रित करने की छूट देते हैं।

प्रस्तावों को हल्का किया जाता है जबतक कि वे निरर्थक नहीं रह जाएं – या पूर्वाग्रहों के बिना देखें तो वे लोकतंत्र विरोधी बन जाते हैं। नैतिक स्पष्टता निरंकुश शासकों के तुष्टिकरण का शिकार बन जाती है, और ये सब होता है आमसहमति बनाने के नाम पर।

ऐसी स्थिति में अमेरिका के लिए हमारे मूल्यों की रक्षा के खातिर अपनी आवाज़ की ताकत का इस्तेमाल करना ज़रूरी हो जाता है। यह बात आज भी उतनी ही सच है जितनी शीत युद्ध के दौरान थी – शायद उससे भी ज़्यादा।

हम दुनिया के लिए एक विशिष्ट संदेश वाला एक विशिष्ट राष्ट्र हैं। हम मानव गरिमा पर आधारित देश हैं; इस क्रांतिकारी विचार पर आधारित कि जीवन, स्वतंत्रता और खुशी पाने के प्रयास के अधिकारों समेत, पर इन तक ही सीमित नहीं, हर मनुष्य समान है। यदि आप इस सच्चाई को गंभीरता से लेते हैं – जैसे राजदूत कर्कपैट्रिक ने लिया था, जैसे मैं लेती हूं – आप समझौता नहीं करते। आप उनको खुश करने के लिए सौदा नहीं करते जो इसे नहीं मानते हैं। और यह कोई राजनीतिक पर्चा नहीं है जिसेकि अधिक मूल्य की किसी चीज़ से बदला जा सके।

यदि आप इसे गंभीरता से लेते हैं, आप अपनी आवाज़ का इस्तेमाल करें। आप इसके लिए लड़ें, भले ही आपके लिए इसका मतलब अकेले लड़ना हो।

अमेरिका की संयुक्तराष्ट्र मानवाधिकार आयोग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका थी क्योंकि हर महिला और पुरुष में अंतर्निहित गरिमा में हमारा विश्वास है। इसके प्रथम अध्यक्ष एलिनोर रूज़वेल्ट के शब्दों में, इसे “विवेक की जगह” होनी थी। जब इसने इस भूमिका को निभाया, मानवाधिकार परिषद, इसका वर्तमान नाम, बेज़ुबानों की आवाज़ बनी। इसने राजनीति कैदियों के साथ होने वाले अन्याय को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया। इसने सीरिया के असद और उत्तर कोरिया के किम की तानाशाही के अपराधों को उजागर किया।

पर ये अपवाद रहे हैं, नियम नहीं।

अक्सर, मानवाधिकार परिषद ने दुनिया के सर्वाधिक अमानवीय शासनों के लिए बचाव उपलब्ध कराया है, निंदा नहीं। यह मानवाधिकार का उल्लंघन करने वालों के लिए एक मंच साबित हुआ है। और मानवाधिकार परिषद विवेक की जगह नहीं, बल्कि राजनीति की जगह साबित हुई है। इसने अनुचित ढंग से और लगातार इजरायल पर ध्यान केंद्रित किया है। इस बीच, इसने वेनेज़ुएला, क्यूबा, ज़िम्बाब्वे और चीन में शासन के अत्याचार को नज़रअंदाज़ किया है।

इस बात पर विचार करते हुए कि यह अपने वायदे से कितना दूर रहा है, मानवाधिकार परिषद संयुक्तराष्ट्र की सबसे बड़ी नाकामी है। इसने मानव गरिमा के विचार को लेकर – जो हमारी राष्ट्रीय पहचान के केंद्र में है और जो प्रत्येक इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है – उसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक और साधन भर बना दिया है। और यह एक बड़ी त्रासदी है। मैं इस निष्कर्ष पर खुशी से, या बिना गंभीरता के नहीं पहुंची हूं।

ओबामा प्रशासन ने 2009 में कथित रूप से “सुधारे गए” मानवाधिकार परिषद से जुड़ने का फैसला किया था। तत्कालीन विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने वायदा किया था कि अमेरिका अंदर रहकर काम करते हुए परिषद को बेहतर बना सकता है।

आठ साल बाद मेरे राजदूत बनने तक, यह स्पष्ट हो गया था कि यह रणनीति नाकाम हो चुकी है। मानवाधिकार परिषद की कई समस्याएं हैं, पर जब मैं संयुक्तराष्ट्र में आई उनमें से दो सामने मौजूद मिलीं ।

पहली थी परिषद की सदस्यता। जब मैं आई थी, और आज भी, इसके सदस्यों में मानवाधिकारों का सबसे बुरा उल्लंघन करने वाले शामिल हैं। क्यूबा, चीन और वेनेज़ुएला के तानाशाही शासनों को परिषद में जगह मिली हुई है। वेनेज़ुएला 2015 में न सिर्फ सदस्य था बल्कि परिषद ने एक विशेष सभा में बोलने के लिए उसके तानाशाह निकोलस मादुरो को आमंत्रित किया था।

उनके सम्मान में खड़े होकर तालियां बजाई गईं, जोकि ये देखते हुए आश्चर्यजनक दृश्य नहीं कही जा सकती कि मानवाधिकार परिषद के सदस्यों में से 62 फीसदी देश लोकतंत्र नहीं थे।

अमेरिका की उपस्थिति परिषद में सुधार कराने में नाकाम रही, इसका दूसरा प्रमुख संकेत था कुख्यात ‘एजेंडा आइटम सेवन’ का कायम रहना।

यह मानवाधिकार परिषद के एजेंडे का स्थायी अंश है जो सिर्फ इजरायल के लिए है। किसी अन्य देश – न ईरान, न सीरिया, न उत्तर कोरिया – के लिए सिर्फ उसको समर्पित कोई एजेंडा विषय नहीं है। एजेंडा आइटम सेवन’ इजरायल के किसी कृत्य पर केंद्रित नहीं है। इजरायल का अस्तित्व ही इसके निशाने पर है।

यह खतरे का स्पष्ट संकेत है जो मानवाधिकार परिषद के राजनीतिक भ्रष्टाचार और नैतिक दिवालिएपन को दर्शाता है।

इन कारणों और अन्य कारणों से, जब हम शासन में आए तो मानवाधिकार परिषद से तत्काल निकलने के लिए ट्रंप प्रशासन को प्रोत्साहित करने वाली आवाज़ें कांग्रेस और अन्य स्थानों से उठ रही थीं। हम आसानी से ऐसा कर सकते थे। पर इसकी जगह, हमने परिषद की समस्याओं को ठीक करने के ईमानदार प्रयास किए।

हमने सार्वजनिक अभियान चलाया। राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले साल संयुक्तराष्ट्र महासभा में अपने भाषण में परिषद में सुधारों की ज़रूरत बताई, और हम पर्दे के पीछे भी लगातार काम करते रहे। हमने सुधारों को अनिवार्य साबित करने में पूरा साल लगा दिया; 125 से अधिक सदस्य राष्ट्रों से मुलाकात की और सुधार प्रस्तावों के मसौदों को प्रसारित किया।

साल बीतते-बीतते, सुधार के लिए हमारा आधार मज़बूत होता गया। अक्तूबर में कांगो लोकतांत्रिक गणतंत्र परिषद की एक सीट के लिए निर्वाचित हुआ। कांगो ऐसे अत्याचारों का केंद्र है जो सर्वाधिक सख्त अंतरराष्ट्रीय सहायताकर्मियों को भी हिला देता है। उन्हें कांगो में सामूहिक कब्र मिल रहे थे, जब संयुक्तराष्ट्र महासभा ने मानवाधिकार परिषद में स्थान के लिए कांगो के दावे को स्वीकृति दी।

दिसंबर में और इस साल, ईरानी जनता अपने भयानक शासकों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए सड़क पर उतर आई। सरकार का जवाब पिटाई, गिरफ्तारियों और हत्याओं के रूप में आया। मानवाधिकार परिषद चुप्पी साधे रही।

और पूरे साल, वेनेज़ुएला बदहाली और तानाशाही में गहरे धंसता गया। पर परिषद ने वेनेज़ुएला में व्यापक मानवाधिकार उल्लंघनों पर कुछ नहीं किया, कारण क्या था मैं समझती हूं आप अनुमान लगा चुके होंगे: वेनेज़ुएला को मानवाधिकार परिषद में जगह मिली हुई है।

आखिर में, अमेरिका पर्याप्त संख्या में देशों को विरोध में खड़े होने और यह घोषणा करने के लिए राज़ी नहीं कर पाया कि मानवाधिकार परिषद अपने नाम के काबिल नहीं रह गई है। ऐसा क्यों हुआ ये स्पष्ट है। पहला और सबसे ज़ाहिर कारण है, अधिकारवादी शासनों का यथास्थिति पर खुश होना।

बहुतों को अपने और अपने सहयोगी राष्ट्रों को मानवाधिकार रिकॉर्डों की जांच से बचाने के लिए सदस्यता चाहिए। रूस, चीन, क्यूबा और मिस्र – इन सबको मानवाधिकार परिषद के मज़ाक का विषय बनने का लाभ मिलता है। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि उन्होंने इसमें सुधार के हमारे प्रयासों का खुला प्रतिकार किया।

इससे भी अधिक चकराने वाली बात थी उन समूहों और देशों की ओर से हमारा विरोध जिन्हें कि बेहतर पता होना चाहिए – उनकी तरफ से विरोध जो मानवाधिकारों और मानव गरिमा में विश्वास करते हैं।

सबसे पहले, इनमें शामिल थे गैरसरकारी संस्थान (एनजीओ) – ऐसे निजी संस्थान जो आमतौर पर मानवाधिकारों के लिए बढ़िया काम करते हैं। वे मानवाधिकार का उल्लंघन करने वालों को परिषद से दूर रखने पर सहमत थे। इसलिए आप हमारे विस्मय को समझ सकते हैं जब वे खुलकर हमारे सुधार प्रस्ताव के खिलाफ आए, अन्य देशों से हमारे खिलाफ मतदान का आह्वान करते हुए। मानवाधिकार के एक अहम मुद्दे पर एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमैन राइट्स वॉच जैसे संगठन रूस और चीन के साथ खड़े हो गए। और मैं चाहूंगी कि उनके इस रवैये का आकलन आप स्वयं करें।

गैरसरकारी संगठनों को डर था कि मानवाधिकार परिषद में परिवर्तन किए जाने से महासभा में प्रतिकूल संशोधन होंगे जिससे परिषद और भी अधिक बुरी स्थिति में आ जाएगी।

इस पर एक सेकेंड गौर करें। उनका मानना है कि किसी बुरी स्थिति में इसलिए सुधार नहीं किया जा सकता, कि इस प्रक्रिया में स्थिति और ज़्यादा बुरी हो सकती है?

यह संयुक्तराष्ट्र में मानवाधिकार के मामले में दुनिया के सबसे बुरे शासनों का सिक्का चलने का एक और उदाहरण है।

यथास्थिति को चुनौती देने में इन गैरसरकारी संगठनों की अनिच्छा के पीछे इन्हें प्राप्त संस्थागत सुविधाओं का भी हाथ है। इनके पास बड़ी संख्या में कर्मचारी हैं और संयुक्तराष्ट्र की नौकरशाही से इनका जुड़ाव है। परिवर्तन उन्हें अपने लिए खतरा लगता है। यदि हम हर चीज़ को उनके रवैये के अनुरूप देखें तो कभी भी किसी चीज़ में कोई सुधार नहीं होगा और आत्मसंतुष्टि का बोलबाला होगा।

इससे भी ज़्यादा परेशानी का कारण थे मानवाधिकार समर्थक देश जिन्होंने खुलकर बोलने से इनकार कर दिया। ये ऐसे देश हैं जो अकेले में, अनौपचारिक बातचीत में, परिषद के कार्यों – और अक्षमताओं – को लेकर हमारी शर्मिंदगी और चिंताओं को साझा करते हैं। उन्होंने हम पर भरोसा कर बताया कि वे भी क्यूबा और वेनेज़ुएला, सउदी अरब और कांगो को परिषद में स्थान मिलने, साथ ही इजरायल पर लगातार हमले को लेकर व्यथित हैं।

उन्हें हमने एक के बाद एक कई मौके दिए। पर मानवाधिकार परिषद की तमाम कमियों के बारे में महीनों तक हमसे सहमत होने के बाद भी वे अपनी बात सामने नहीं रखते जब तक वे बंद कमरे में, और सार्वजनिक दृष्टि से दूर नहीं हों।

ये देश हर इंसान में अंतर्निहित गरिमा में हमारे विश्वास से सहमत हैं, फिर भी उनमें बदलाव लाने का साहस नहीं है।

उनके पास अपनी आवाज़ है। वे बस उसका इस्तेमाल करने से इनकार करते हैं।

19 जून को विदेश मंत्री पोम्पियो और मैंने घोषणा की कि अमेरिका मानवाधिकार परिषद से वापस निकल रहा है। हमारे अनेक मित्रों ने हमें संस्था के खातिर उसमें बने रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि परिषद की बचीखुची विश्वसनीयता अमेरिका के कारण ही है।

पर ठीक इसी कारण हम वापस निकले हैं।

आज़ादी के साथ बोलने, मुक्त होकर संगठित होने और उपासना करने का अधिकार; अपने भविष्य का स्वयं निर्धारण करना; कानून के समक्ष बराबरी – ये सब पावन अधिकार हैं। हम इन अधिकारों को गंभीरता से लेते हैं – इतनी गंभीरता से कि हम किसी संस्थान को इसके अवमूल्यन की अनुमति नहीं दे सकते – खासकर उसको जो खुद को “मानवाधिकार परिषद” कहता हो।

किसी को भी मानवाधिकार परिषद की सदस्यता को मानवाधिकारों को समर्थन से नहीं जोड़ना चाहिए। आज तक अमेरिका, संयुक्तराष्ट्र के भीतर और दुनिया भर में, मानवाधिकारों के लिए किसी भी देश से ज़्यादा काम करता रहा है। और हम ऐसा करते रहेंगे। हम बस उस परिषद के भीतर ऐसा नहीं करेंगे जो लगातार मानवाधिकारों को लेकर निराश करती है।

हमने पहले ही मानवाधिकारों के लिए आधार बनाना शुरू कर दिया है, और इस पर न्यूयॉर्क में संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद में विचार होना चाहिए।

गत वर्ष, अमेरिका की अध्यक्षता के दौरान, हमने मानवाधिकारों तथा शांति और सुरक्षा के बीच संबंधों पर समर्पित सुरक्षा परिषद की पहली बैठक का आयोजन किया।

लड़ाई और अस्थिरता जोकि सीरिया और बर्मा जैसे देशों की सीमाओं के बाहर तक फैल चुकी है, इन देशों की जनता के मानवाधिकारों के व्यापक और चरम उल्लंघनों से शुरू हुई थी।

मानवाधिकारों के उल्लंघन करने वालों की हम उनके स्तर पर निंदा करते हैं, पर वे ऐसे संघर्षों का भी कारण बनते हैं जो पूरे क्षेत्र की शांति पर खतरा बन जाता है। जब हम मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाते हैं, हम संघर्षों को रोकने का काम करते हैं।

इसी महीने, हमने मानवाधिकारों के संरक्षण और प्रोत्साहन को समर्पित संयुक्तराष्ट्र शांतिरक्षकों की संख्या में भारी कटौती के रूस और चीन के प्रयासों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया।

और अमेरिका ने वो पहल की है जिसे करने से मानवाधिकार परिषद ने इनकार कर दिया था। वेनेज़ुएला सरकार प्रायोजित विरोध प्रदर्शनों के बावजूद अमेरिका ने जेनेवा में मानवाधिकार परिषद के बाहर वेनेज़ुएला पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस साल जनवरी में हमने ईरानी शासन द्वारा मानवाधिकार उल्लंघनों पर सुरक्षा परिषद का सत्र आयोजित कराया। और अभी पिछले सप्ताह ही अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में दक्षिण सूडान के लड़ाकों पर हथियारों की पाबंदी लागू कराने के लिए एक ऐतिहासिक प्रयास की अगुवाई की। देश की स्थापना के बाद की संक्षिप्त अवधि में ही दक्षिण सूडान भारी त्रासदी और मानवाधिकार उल्लंघनों का केंद्र रहा है।

और जैसाकि मैंने पहले कहा, मानवाधिकार परिषद से हमारे निकलने का ये मतलब नहीं है कि हमने परिषद में सुधारों की अपनी लड़ाई छोड़ दी है। इसके विपरीत, परिषद की पुनर्संरचना के लिए हमारे साथ काम करने का इच्छुक कोई भी देश बस हमें ऐसा बताए। मानवाधिकार परिषद की संस्थागत कमियों को दूर करना संयुक्तराष्ट्र की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है और रहेगा।

मैंने इथियोपिया, कांगो, तुर्की और जॉर्डन के शरणार्थी शिविरों का दौरा किया है। मैं उन मांओं से मिली हूं जो सदमे से पीड़ित हैं। मैंने चोटिल, लक्ष्यहीन बच्चों को अज्ञानता और अतिवाद की भेंट चढ़ते देखा है। उनसे जुड़ी यादें मुझे हमेशा परेशान करेंगी। जब तक हमारे पास आवाज़ है, हमें इन मांओं और बच्चों के हित में उसका इस्तेमाल करना चाहिए। मैं अपनी आवाज़ का इस्तेमाल करूंगी। सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं एक मां हूं। सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं एक राजदूत हूं। पर इसलिए कि मैं एक अमेरिकी हूं। और अमेरिका मानवाधिकार के आदर्शों को नहीं छोड़ सकता क्योंकि यह खुद को छोड़ने से बढ़कर होगा।

यही तो हैं हम।

इसी पर तो हमें गर्व है। और ऐसे ही रहेंगे हम हमेशा।

धन्यवाद, और आप पर ईश्वर की कृपा हो।


मूल सामग्री देखें: https://usun.state.gov/remarks/8519
यह अनुवाद एक शिष्टाचार के रूप में प्रदान किया गया है और केवल मूल अंग्रेजी स्रोत को ही आधिकारिक माना जाना चाहिए।
ईमेल अपडेट्स
अपडेट्स के लिए साइन-अप करने या अपने सब्सक्राइबर प्राथमिकताओं तक पहुंचने के लिए कृपया नीचे अपनी संपर्क जानकारी डालें