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ईरान से सामना: ट्रम्प प्रशासन की रणनीति

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अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट
प्रवक्ता कार्यालय
माइकल आर. पोम्पेयो 15 अक्टूबर, 2018

 

शीत युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिकी नीति निर्माताओं और विश्लेषकों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौतियों के बारे में नए तरीके से सोचने पर मजबूर होना पड़ा है। अल कायदा का उदय, साइबर अपराधियों, और अन्य खतरनाक संस्थाओं ने राज्य विरोधी तत्वों यानी नॉन स्टेट एक्टर्स के खतरे की पुष्टि की है। लेकिन इनके समान ही गैरकानूनी सत्ताओं के पुनरुत्थान की चुनौती भी सामने आई है—दुष्ट राष्ट्र जो अंतरराष्ट्रीय मानकों को उल्लंघन करते हैं, मानवाधिकारों और बुनियादी आज़ादियों का सम्मान नहीं करते, और अमेरिकी नागरिकों, उसके सहयोगियों और साझेदारों, और शेष दुनिया की सुरक्षा के खिलाफ काम करते हैं।

ऐसी गैरकानूनी सत्ताओं में उत्तर कोरिया और ईरान मुख्य हैं। इनकी ओर से अंतर्राष्ट्रीय शांति व्यवस्था के उल्लंघन के कई मामले हैं, लेकिन दोनों ही देश अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए खतरनाक तरीके से दशकों से परमाणु हथियार कार्यक्रम चला रहे हैं। कूटनीतिक स्तर पर वाशिंगटन के श्रेष्ठतम प्रयासों के बावजूद प्योंग्यांग जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश प्रशासन के समय से ही एक खंडित शस्त्र नियंत्रण समझौते के ज़रिए अमेरिकी प्रशासन की आंखों में धूल झोंकता रहा है। उत्तर कोरिया का परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम तेज़ गति से जारी है, यह इस तरह से चल रहा है कि डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उनसे कहा था कि यह उनके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे गंभीर चुनौती होगी। इसी तरह, ईरान के साथ ओबामा प्रशासन का 2015 का समझौता-संयुक्त विस्तृत कार्ययोजना, या कि JCPOA—भी परमाणु हथियारों की उसकी आकांक्षाओं को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया। वास्तव में, चूंकि ईरान जानता था कि ओबामा प्रशासन समझौते को बचाए रखने को अन्य सभी चीज़ों के ऊपर प्राथमिकता देगा, JCPOA से ईरानी शासन के मन में दंड से बचे रहने की भावना पैदा हुई और उसने खतरनाक गतिविधियों के लिए अपना समर्थन बढ़ा दिया। इस समझौते से तेहरान को भारी मात्रा में धन भी मिला, जिसका वहां के सर्वोच्च नेता ने पूरे मध्य पूर्व में (कुछ प्रतिक्रिया में घटनाएं हुईं) सभी तरह के आतंकवाद को प्रायोजित करने में इस्तेमाल किया है और एक ऐसे शासन की अर्थव्यवस्था को बढ़ाया जो अपनी क्रांति को दुनिया भर में फैलाने और अपने देश में लागू करने पर आमादा है।

यह कि इराक युद्ध के बाद उत्तर कोरिया तथा ईरान की तरफ से बढ़े खतरे ने इस सवाल को और जटिल बना दिया है कि इससे किस तरह से निपटा जाए; अमेरिकी व्यापक विनाश के हथियारों से सुरक्षा के नाम पर एक लंबी सैन्य प्रतिबद्धता पर आने वाले खर्चों को लेकर ठीक ही उलझन में हैं। इराक की मुश्किलें दिमाग में ताज़ा हैं ही, और यह भी पता है कि उत्तर कोरिया तथा ईरान के साथ हुए पिछले समझौते खतरों को कम करने में नाकाम साबित हुए हैं, इन अड़ियल सत्ताओं को नुकसान पहुंचाने से रोकना नए कूटनीतिक मानदंडों की मांग करता है।

राष्ट्रपति ट्रम्प का प्रवेश। वाशिंगटन सत्ता प्रतिष्ठान अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी की उनकी शैली पर दांव लगा रहा है, उनकी कूटनीति एक सोचे-समझे दृष्टिकोण पर टिकी है जो अमेरिका को गैरकानूनी सत्ताओं का मुकाबला करने में लाभ पहुंचाती है।

ट्रम्प सिद्धांत

अभियान के दौरान और दफ्तर में आने पर दोनों में, राष्ट्रपति ट्रम्प का स्पष्ट मत है कि अमेरिकी सुरक्षा को पहले स्थान पर रखने के लिए अमेरिकी नेतृत्व का मज़बूत होना ज़रूरी है। यह सामान्य सिद्धांत ओबामा प्रशासन के “पीछे रहकर नेतृत्व” करने के पसंदीदा ढंग से उलट है, जो एक समझौतापरस्त रणनीति थी जिसने अमेरिकी ताकत और प्रभाव को गलत ढंग से कम किया। पीछे रहकर नेतृत्व करने के चलते उत्तर कोरिया आज बड़ा खतरा बन गया है, जो पहले कभी ऐसा नहीं था। पीछे रहकर नेतृत्व करने का सबसे अच्छा नतीजा यह रहा कि ईरान के परमाणु शक्ति बनने में विलंब हुआ, जबकि इस्लामिक गणराज्य के घातक प्रभाव और आतंकी खतरे को बढ़ने की इजाज़त मिली।

आज, उत्तर कोरिया और ईरान दोनों को घोषित तौर पर बता दिया गया है कि अमेरिका उनकी अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों को बेरोकटोक नहीं चलने देगा। उत्तर कोरिया के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में आक्रामक बहुराष्ट्रीय दबाव अभियान के साथ ही राष्ट्रपति के ज़रूरत पड़ने पर अपने हितों की रक्षा के लिए अमेरिका के बल प्रयोग भी करने संबंधी स्पष्ट और बेलाग बयानों से बातचीत का माहौल तैयार हुआ तथा राष्ट्रपति ट्रम्प और चेयरमैन किम जोंग के बीच इसी पिछले जून में सिंगापुर में वार्ता हुई। वहीं पर चेयरमैन किम ने उत्तर कोरिया को अंतिम, पूरी तरह से परमाणु हथियार मुक्त बनाने की प्रतिबद्धता जताई। उत्तर कोरिया ने पहले भी इस तरह की प्रतिबद्धताएं की थीं, लेकिन उनसे अलग, यह पहली बार था कि व्यक्तिगत तौर पर नेताओं के बीच आमने-सामने परमाणु मुक्त करने की प्रतिबद्धता जताई गई। चेयरमैन किम की ओर से यह एक प्रमुख रणनीतिक बदलाव हो सकता है या नहीं भी हो सकता है, और हमें उनके इरादों को भांपने के लिए बहुत काम करना है और यह सुनिश्चित करना है कि वह अपनी प्रतिबद्धता पर अमल करें। लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प के इस दृष्टिकोण ने राष्ट्रीय सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान का अवसर पैदा किया है जो लंबे समय से नीति निर्माताओं को तंग करता रहा है। राष्ट्रपति, उत्तर कोरिया के लिए हमारे विशेष दूत (स्टीफन बाइगन), और मैं इस अवसर को भुनाने के लिए स्पष्ट दृष्टि से काम करते रहेंगे।

इसी तरह, ईरान के साथ भी ट्रम्प प्रशासन ईरानी शासन (खासकर सर्वोच्च नेता की सीधे नियंत्रण वाले ईरानी सेना के उस इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) की आर्थिक ताकत को कमजोर करने के लिए अधिकतम दबाव अभियान चला रहा है, जो लेबनान में हिजबुल्ला के ज़रिए, फलस्तीन में हमास के ज़रिए, सीरिया में असद शासन को, यमन में हौथी विद्रोहियों के ज़रिए, इराक में शिया मिलीशिया के ज़रिए, और दुनिया भर में अपने एजेंटों के ज़रिए हिंसा फैलाने के लिए आर्थिक मदद मुहैया करा रहा है।

फिर भी राष्ट्रपति ट्रम्प मध्य पूर्व—या अन्य किसी क्षेत्र में, इस कार्य के लिए लंबे समय तक अमेरिकी सेना को लगाना नहीं चाहते हैं। उन्होंने 2003 में इराक में हमले और 2011 में लीबिया में हस्तक्षेप के खतरनाक नतीजों के बारे में खुलेआम अपनी बात कही है। जानकार भले ही इसका डर जताते हों कि यह प्रशासन अमेरिका को युद्ध में धकेल देगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि अमेरिकियों को एक ऐसा राष्ट्रपति मिला है, जो हालांकि सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने से हिचकेगा नहीं (इस्लामिक स्टेट, तालिबान, या असद शासन इसकी गवाही देंगे), मगर इसका इस्तेमाल करने के लिए लालायित भी नहीं है। भारी भरकम सैन्य बल अमेरिकी लोगों की रक्षा के लिए हमेशा आगे रहेगा, लेकिन यह पहला विकल्प नहीं होना चाहिए।

राष्ट्रपति की कूटनीति का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है कि वह अमेरिका के कट्टर विरोधियों से बातचीत करने के लिए तत्पर हैं। जैसा कि उन्होंने जुलाई में कहा था, “कूटनीति और बातचीत को संघर्ष और दुश्मनी पर तरजीह दी जानी चाहिए।” उत्तर कोरिया के प्रति उनके दृष्टिकोण पर विचार करें: चेयरमैन किम के साथ उनकी कूटनीति ने हर दिन बढ़ रहे तनाव को खत्म कर दिया है।

राष्ट्रपति की खराब समझौतों से बचाव की सहज प्रकृति बातचीत के लिए तत्परता की पूरक बन गई है। किसी भी वार्ता में फायदा की अहमियत की उनकी समझ JCPOA जैसे समझौतों की गंभार प्रतिकूल संभावनाओं को खत्म कर देती है।  वह अमेरिका के विरोधियों के साथ समझौते करने के इच्छुक हैं, लेकिन अगर उससे अमेरिका का कोई हित नहीं होता हो, तो वह बातचीत से हटने में भी उतने ही सहज हैं। यह JCPOA पर ओबामा प्रशासन के दृष्टिकोण से एकदम उलट नज़रिया है, जिसमें समझौता ही एक लक्ष्य बन गया था, जिसे हर हाल में हासिल करना था।

उत्तर कोरिया के साथ भावी समझौते पर विचार करते हुए जो कि JCPOA से बेहतर है, हमने अपने उद्देश्य को “कोरियाई प्रायद्वीप के अंतिम, पूरी तरह सत्यापित तौर पर परमाणु मुक्त करने के रूप में वर्णित किया है, जैसा कि चेयरमैन किम जोंग उन द्वारा सहमति व्यक्त की गई है।” “अंतिम” यानी फाइनल का मतलब है कि उत्तर कोरिया द्वारा अपने सामूहिक विनाश के हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के दोबारा शुरू करने की संभावना नहीं है—ईरान के साथ समझौते में JCPOA में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। “पूरी तरह सत्यापित” का मतलब है कि सत्यापन के लिए कहीं अधिक मज़बूत मानक होंगे जिसका JCPOA में अभाव था। JCPOA की अन्य कमज़ोरियों में एक यह भी था कि प्रमुख ईरानी सैन्य सुविधाओं का निरीक्षण आवश्यक नहीं बनाया गया था। उत्तर कोरिया के साथ समझौते की सटीक रूपरेखा पर अभी बातचीत होनी है, लेकिन “अंतिम” और “पूरी तरह सत्यापित” वे केंद्र बिंदु हैं जिन पर हम किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे।

ईरानी खतरा

राष्ट्रपति ट्रम्प की अमेरिकी लोगों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता, सैन्य बल के अनावश्यक उपयोग से विमुखता और विरोधियों से बात करने की उनकी इच्छा, ने निरंकुश शासनों का सामना करने के लिए एक नया ढांचा प्रदान किया है। और आज, ईरान की तुलना में अधिक निरंकुश चरित्र वाली कोई गैरकानूनी सत्ता नहीं है। यह स्थिति 1979 से रही है, जब एक अपेक्षाकृत छोटे से इस्लामिक विद्रोही कैडर ने सत्ता हथियाई थी।  शासन की इस विद्रोही मानसिकता ने तभी से ही उसके कार्यों को प्रेरित किया है—वास्तव में, उसकी स्थापना के तुरंत बाद से, IRGC ने अपनी खास सैन्य इकाई, कुद्स फोर्स तैयार की, और उसे विदेशों में क्रांति के निर्यात का काम सौंपा। तबसे, शासन के अधिकारियों ने इस क्रांति को वित्त पोषित करने के लिए ईरानी लोगों के प्रति उनके उत्तरदायित्व सहित अपनी दूसरी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारियों को गौण बना डाला।

नतीजतन, पिछले चार दशकों में, ईरान शासन ने विनाश और अस्थिरता की बड़े पैमाने पर फसल बोई है, एक ऐसा बुरा व्यवहार जो JCPOA के साथ भी खत्म नहीं हुआ। इस समझौते ने ईरान की एक परमाणु हथियार की तलाश को स्थायी रूप से नहीं रोका—असल में, अप्रैल में ईरान के शीर्ष परमाणु अधिकारी का बयान कि उनका देश कुछ ही दिनों में अपना परमाणु कार्यक्रम दोबारा शुरू कर सकता है, यह बताता है कि उसने उस कार्यक्रम को शायद बिलकुल भी नहीं रोका।  इस समझौते ने अफगानिस्तान, इराक, लेबनान, सीरिया, यमन और गाज़ा में ईरान की हिंसक और अस्थिर गतिविधि पर रोक नहीं लगाई। ईरान अभी भी हौथियों को उन मिसाइलों की आपूर्ति करता है जो सऊदी अरब पर दागी जाती हैं, इज़रायल पर हमास के हमलों का समर्थन करता है, और सीरिया में लड़ने और मरने के लिए उतारू अफगानी, इराकी और पाकिस्तानी युवाओं की भर्ती करता है। ईरानी अनुदान की वजह से, औसत लेबनानी हिजबुल्ला लड़ाका उससे दो से तीन गुना कमाता है जितना एक तेहरान का दमकल कर्मी घर ले जाता है।

मई 2018 में, राष्ट्रपति ट्रम्प ने परमाणु समझौते से हाथ खींच लिया, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका या हमारे सहयोगियों या भागीदारों के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा नहीं कर पा रहा था, न ही यह ईरान से एक सामान्य राष्ट्र की तरह व्यवहार करवा पा रहा था। जुलाई में, फ्रांस की एक राजनैतिक रैली में बम विस्फोट करने की फिराक़ में लगे आतंकवादियों को विस्फोटकों की आपूर्ति करने के लिए वियना में बसे एक ईरानी राजनयिक को गिरफ्तार किया गया। यह बता रहा है कि जबकि जो ईरान के नेता यूरोप को परमाणु समझौते में बने रहने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं, वही चोरी-छिपे महाद्वीप के केंद्र में आतंकी हमलों की साजिश रचते हैं। कुल मिलाकर, ईरान के कामों ने उस देश को परित्यक्त बना दिया है, बहुत कुछ उसके अपने लोगों की मायूसी के लिए।

दबाव अभियान

ईरानी परमाणु समझौते के स्थान पर, राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक बहुपक्षीय दबाव अभियान शुरू किया है। आर्थिक प्रतिबंध इसका पहला घटक हैं। राष्ट्रपति ने संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कम अवसर लागत वहन करते  हुए भी ईरानी शासन को निचोड़ने के लिए प्रतिबंधों की ताकत को पहचाना है। ट्रम्प प्रशासन के अंतर्गत, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान से संबंधित 147 व्यक्तियों और संस्थाओं को निशाना बनाते हुए, ईरान संबंधी प्रतिबंधों के 17 दौर लगाए हैं।

इन आक्रामक प्रतिबंधों का लक्ष्य ईरानी शासन को किसी एक विकल्प चुनने के लिए मजबूर करना है: या तो उन नीतियों को रोके या फिर जारी रखे जिनके कारण उसके ऊपर प्रतिबंध लगे हैं। ईरान के अपनी विध्वंसक गतिविधियों को जारी रखने के फैसले ने पहले ही गंभीर आर्थिक दुष्परिणाम दिए हैं, जिसे अधिकारियों के अपने स्वार्थ के कारण किए गए बड़े पैमाने के कुप्रबंधन ने और भी बदतर बना दिया है। IRGC द्वारा निजीकरण की बहाने अर्थव्यवस्था में व्यापक छेड़छाड़, ईरान में व्यापार करने को एक हानिकारक पेशकश बना रही है, और विदेशी निवेशक नहीं जान पा रहे हैं कि वे वाणिज्य को सुलभ बना रहे हैं या आतंकवाद को। JCPOA ने जो संपदा पैदा की उसका उपयोग ईरानी लोगों के भौतिक कल्याण को बढ़ाने के लिए करने के बजाय, शासन ने परजीवी के रूप में उसका उपभोग किया और तानाशाहों, आतंकियों और दुष्ट मिलीशियाओं की मदद करने के लिए अरबों-खरबों बहा दिये। ईरानी साफ-साफ हताश दिख रहे हैं। पिछले एक साल में ईरानी रियाल भरभरा गया है। एक तिहाई ईरानी युवा बेरोज़गार हैं। वेतन भुगतान न होने से बड़े पैमाने पर हड़तालें हो रही हैं। ईंधन और पानी की कमी आम है।

यह बीमारी ईरानी शासन की खुद की पैदा की गई समस्या है। ईरानी अभिजात्य वर्ग अपने अपने धोखाधड़ी के धंधे और भ्रष्टाचार में माफिया जैसे दिखता है। दो साल पहले, ईरानी उचित ही गुस्से से उबल पड़े जब लीक हुई वेतन पर्चियों से मालूम हुआ कि वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के बैंक खातों में बेवजह बड़ी मात्रा में पैसा जा रहा है। सालों तक, क्लर्क और अधिकारी खुद को धर्म के चोले में ढक ईरानी लोगों को अंधा बनाकर लूटते रहे। आज, प्रदर्शनककारी शासन के खिलाफ नारे लगाते हैं “तुमने हमें धर्म के नाम पर लूटा है।” लंदन स्थित अखबार कायहान के मुताबिक, ईरानी न्यायपालिका का प्रमुख अयातुल्ला सादिक लारिजानी, जिसे अमेरिका ने मानवाधिकारो के हनन के लिए प्रतिबंधित किया है, सार्वजनिक धन के गबन के कारण कम से कम $300 मिलियन की संपत्ति का मालिक है। एक बड़ा मुफ्ती नासेर मकारेम शिराजी भी कई मिलियन डॉलर का मालिक है। ईरानी सरकार पर घरेलू चीनी उत्पादकों का अनुदान कम करने का दबाव डालकर जबकि बाज़ार को खुद की अधिक महंगी आयातित चीनी से पाटकर वह “शक्कर का सुल्तान” के रूप में जाना जाने लगा। इस प्रकार की गतिविधि आम ईरानियों को काम से बाहर कर देती है। तेहरान में कम से कम 30 सालों से शुक्रवार की नमाज़ की अगुआई करने वाले अयातुल्ला मोहम्मद इमामी काशानी ने सरकार से अपने निजी फाउंडेशन में कई फायदेमंद खदानों का ट्रांसफर करवा लिया। वही भी कई मिलियन की संपत्ति का मालिक है। भ्रष्टाचार सर्वोच्च स्तर तक पहुंच गया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनी के पास अपना व्यक्तिगत, खाता-बहियों से बाहर एक हेज फंड है जिसे सेताद कहा जाता है, जिसकी कीमत $95 बिलियन है। बगैर कर लगाई गई और बुरे तरीकों से प्राप्त संपत्ति जो अक्सर राजनीतिक और धार्मिक अल्पसंख्यकों की संपत्तियों पर कब्जा करके अर्जित की जाती है, इसका उपयोग IRGC के अवैध कामों की फंडिंग के लिए किया जाता है।  दूसरे शब्दों में, ईरान का सर्वोच्च पवित्र व्यक्ति एक तरह से तीसरी दुनिया के दादा लोगों की लूटमार वाली खासियतों से भरपूर है।

शासन की लालच ने ईरान और उनके नेताओं के बीच एक गहरी खाई पैदा की है, जिससे अधिकारियों के लिए युवा ईरानियों को क्रांति की अगली पीढ़ी का अगुआ बनने के लिए दृढ़ता से मनाने में मुश्किल हो रही है। धार्मिक अयातुल्ला दिन रात “इज़रायल के लिए मौत” और “अमेरिका के लिए मौत” का प्रवचन दे सकते हैं, लेकिन वे अपने ऊंचे दर्जे के पाखंड को छिपा नहीं सकते। ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावद ज़रीफ, के पास सैन फ्रांसिस्को राज्य विश्वविद्यालय और डेनवर विश्वविद्यालय की डिग्रियां हैं, और सर्वोच्च नेता के शीर्ष सलाहकार अली अकबर विलायती ने जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय में पढ़ाई की है। खामेनी खुद एक बीएमडब्ल्यू में घूमता है जबकि ईरानी लोगों को ईरान में बने सामान खरीदने के लिए कहता है। यह घटनाक्रम 1970 और 1980 के दशक में सोवियत संघ में हुए घटनाक्रमों के समान ही है, जब 1917 की धारणा ने अपने पैरोकारों के पाखंड के कारण पोल खोलने की शुरुआत की। पोलित ब्यूरो अब सामने आकर सोवियत नागरिकों को कम्युनिज्म को अपनाने के लिए नहीं कह सकता था जबकि सोवियत अधिकारी खुद चुपके से तस्करी की हुई नीली जीन्स और बीटल्स के रिकॉर्डों के दीवाने थे।

ईरानी नेता—खासतौर पर वे जो कि IRGC में शीर्ष पर हैं, जैसे कि क़ासिम सुलेमानी, जो कुद्स फोर्स के प्रमुख हैं, उन्हें उनकी हिंसा और भ्रष्टाचार के दर्दनाक परिणामों का एहसास कराया जाना चाहिए। यह देखते हुए कि ईरानी शासन खुद को पुष्ट करने और एक क्रांतिकारी विचारधारा की चाहत से नियंत्रित होता है, जिससे वह आसानी से अलग नहीं होगा, यदि ढीठ आदतों को बदलना है तो प्रतिबंधों को और कड़ा बनाना होगा। यही कारण है कि ट्रम्प प्रशासन उन अमेरिकी प्रतिबंधों को दोबारा लगा रहा है जिन्हें परमाणु समझौते के हिस्से के रूप में उठा लिया या माफ कर दिया गया था; इनमें से पहला 7 अगस्त को प्रभावी हो गया था, शेष 5 नवंबर को वापस आ रहे हैं। हम 4 नवंबर तक जितना संभव हो सके ईरानी कच्चे तेल के वैश्विक आयात को शून्य के नजदीक लाना चाहते हैं। ईरानी शासन की आतंकी फंडिंग को कुचलने के हमारे अभियान के हिस्से के रूप में, हमने संयुक्त अरब अमीरात के साथ एक ऐसे करेंसी एक्सचेंज नेटवर्क को बाधित करने के लिए भी काम किया है जो कि कुद्स फोर्स को लाखों डॉलर ट्रांसफर कर रहा था। संयुक्त राज्य अमेरिका हर उस देश से ईरानी लोगों के लिए खड़े होने और हमारे दबाव अभियान में शामिल होने के लिए कह रहा है जो इस्लामी गणराज्य के विनाशकारी व्यवहार से परेशान है और थक गया है। हमारे प्रयासों का सक्षम नेतृत्व ईरान के लिए हमारे विशेष प्रतिनिधि, ब्रायन हुक द्वारा किया जाएगा।

आर्थिक दबाव अमेरिकी अभियान का एक हिस्सा है। प्रतिरोध इसका दूसरा हिस्सा है। राष्ट्रपति ट्रम्प ईरान को परमाणु कार्यक्रम फिर से शुरू करने या अपनी अन्य घातक गतिविधियों को जारी रखने से हतोत्साहित करने के स्पष्ट कदमों में विश्वास करते हैं। ईरान और अन्य देशों के साथ, उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे संयुक्त राज्य अमेरिका को धमकाने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं करेंगे; यदि अमेरिकी सुरक्षा को खतरा होता है तो वह पलटकर कड़ा प्रहार करेंगे। चेयरमैन किम ने इस दबाव को महसूस किया है, और वह कभी भी इसके बिना सिंगापुर में बातचीत की मेज पर नहीं आते। राष्ट्रपति के अपने सार्वजनिक संचार खुद एक प्रतिरोध तंत्र के रूप में कार्य करते हैं। जुलाई में ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी को लक्षित अपने ऑल-कैप्स ट्वीट में, जिसमें उन्होंने ईरान को संयुक्त राज्य अमेरिका को धमकाना बंद करने का निर्देश दिया है, ऐसा एक रणनीतिक गणित के आधार पर किया गया था: ईरानी शासन अमेरिका की सैन्य विशालता को समझता है और उससे डरता है। सितंबर में इराक में मिलीशिया ने बगदाद में अमेरिकी दूतावास परिसर में और बसरा में अमेरिकी महावाणिज्य दूतावास में जानलेवा रॉकेट हमले किये। ईरान ने इन हमलों को नहीं रोका, जो कि उसकी फंडिग, प्रशिक्षण, और हथियारों के सहयोग वाले पिट्ठुओं (प्रॉक्सी) द्वारा किए गए थे। संयुक्त राज्य अमेरिका तेहरान की सत्ता को ऐसे किसी भी हमले के लिए जिम्मेदार ठहराएगा जो कि हमारे कर्मियों को चोट पहुंचाने या हमारी सुविधाओं को नुकसान पहुंचाने का कारण बनेंगे। अमेरिका अमेरिकियों की जीवन रक्षा में तेजी से और निर्णायक जवाब देगा।

हम युद्ध नहीं चाहते। लेकिन हमें यह दर्दनाक रूप से स्पष्ट करना होगा कि इसका बढ़ना ईरान के लिए नुकसानदायक होगा; इस्लामी गणराज्य अमेरिका की सैन्य ताकत का मुकाबला नहीं कर सकता, और हम ईरानी नेताओं को यह जताने से नहीं डरते।

ईरान का पर्दाफाश

ईरान के खिलाफ अमेरिकी दबाव अभियान का एक अन्य महत्वपूर्ण घटक शासन की क्रूरता को सामने लाने की प्रतिबद्धता है। गैरकानूनी तानाशाही सत्ताएं बस एक ही चीज़ से सबसे ज्यादा डरती हैं और वह है उनके असली कामकाज से पर्दे का उठ जाना। ट्रम्प प्रशासन ईरानी शासन के अवैध राजस्व स्रोतों, दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों, कुटिल कार्रवाइयों और क्रूर उत्पीड़न का खुलासा करना जारी रखेगा। ईरानी लोग उस निजी हित के विकृत स्तर को जानने के हकदार हैं जो ईरानी शासन के लिए ईंधन का काम करता है। खामेनी और उसके जैसे लोग उस घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय नाराज़गी बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे जो तब उपजेगी जब उनके द्वारा किए गए सभी काम सामने आएंगे। पिछले साल की शुरुआत में, प्रदर्शनकारीयों ने सड़कों पर उतर कर कहा “सीरिया को छोड़ो, हमारे बारे में सोचो!” “लोग गरीब हैं जबकि मुल्ला देवताओं की तरह रहते हैं!” संयुक्त राज्य अमेरिका ईरानी लोगों के साथ खड़ा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने खुलासे की इस ताकत को समझ लिया था, जब उन्होंने सोवियत संघ को “एक दुष्ट साम्राज्य” के रूप में प्रस्तुत किया था। शासन के बुरे कामों को उजागर करके, वह उन लोगों के साथ एकजुटता की प्रतिज्ञा कर रहे थे जो लंबे समय से साम्यवाद के तहत पीड़ित हो रहे थे। यह भी उसी तरह ईरानी लोगों के लिए है कि ट्रम्प प्रशासन ईरानी शासन के बर्बर घरेलू दमन का पर्दाफाश करने से डरता नहीं है। ईरानी सत्ता कुछ विचारधारात्मक सिद्धांतों से बहुत डरी हई है—जिसमें छद्म युद्ध के माध्यम से इस्लामी क्रांति का निर्यात और साथी मुस्लिम बहुमत वाले देशों का विनाश, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका का कड़ा विरोध, और महिलाओं के अधिकारों को प्रतिबंधित करने वाले कड़े सामाजिक नियंत्रण शामिल हैं—कि यह किन्हीं भी विरोधी विचारों को सहन नहीं कर सकता है। इसलिए, दशकों से इसने अपने लोगों को मानवाधिकार, गरिमा और बुनियादी आज़ादियों से वंचित कर रखा है। यही कारण है कि मई में, उदाहरण के लिए, ईरानी पुलिस ने एक जिमनास्ट किशोरी मेदेह होजाब्री को उसके नाचने वाले वीडियो इंस्टाग्राम पर पोस्ट करने पर गिरफ्तार कर लिया।

ईरानी शासन के विचार महिलाओं के विशेष रूप से प्रतिकूल हैं। क्रांति के बाद से, महिलाओं को हिजाब पहनना ज़रूरी है, और इस नियम को लागू करने के लिए सरकारी नैतिक पुलिस ने सड़कों पर महिलाओं को पीटती और उन लोगों को गिरफ्तार करती है जो इसका पालन करने से इनकार करते हैं। महिलाओं के परिधान की इस नीति के खिलाफ हालिया विरोध प्रदर्शनों से पता चलता है कि यह नीति नाकाम रही है, और खमेनी को यकीनन इसका पता होना चाहिए। फिर भी जुलाई में, एक कार्यकर्ता को हिजाब हटाने के लिए 20 साल कैद की सजा सुनाई गई थी।

ईरानी शासन भी बहाई, ईसाई और गोनाबादी सहित धार्मिक या जातीय अल्पसंख्यकों को नियमित रूप से गिरफ्तार कर लेता है, जब भी वे अपने अधिकारों के समर्थन में बोलते हैं। बड़ी संख्या में ईरानी एविन कारागार में प्रताड़ित किए जाते हैं और मर जाते हैं—यह एक ऐसी जगह है जो केजीबी के खूंखार मुख्यालय लुब्यांका के तहखाने से कम बर्बरतापूर्ण नहीं है। उस कैद में कई निर्दोष अमेरिकी शामिल हैं जिन्हें फर्जी आरोपों के नाम पर हिरासत में लिया गया है, जो कि ईरानी शासन की बंधकों का इस्तेमाल करने वाली विदेश नीति के आसान शिकार हैं।

बीते दिसंबर की शुरुआत से, प्रदर्शनकारियों ने तेहरान, काराज, इस्फ़हान, अराक और कई अन्य शहरों की सड़कों पर बेहतर ज़िंदगी के शांतिपूर्ण आह्वान के साथ उतरे। जवाब में, ईरानी शासन ने जनवरी में नए साल का स्वागत मनमाने ढंग से 5,000 तक की संख्या में उन्हें गिरफ्तार करके किया। सैकड़ों लोग जेल की सलाखों के पीछे अभी भी कैद हैं, और एक दर्जन से ज्यादा लोग अपनी ही सरकार के हाथों जान गंवा चुके हैं। ईरानी नेता खुदकुशी कहकर इन मौतों का मज़ाक उड़ा रहे हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के चरित्र को ध्यान में रखते हुए है कि हम इन दुर्व्यवहारों का पर्दाफाश करते हैं। जैसा कि राष्ट्रपति रीगन ने 1988 में मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के एक भाषण में कहा था, “स्वतंत्रता इस बात की मान्यता है कि किसी भी व्यक्ति, किसी भी प्राधिकार या सरकार का सच्चाई पर एकाधिकार नहीं है, लेकिन हर व्यक्तिगत जीवन अनन्त रूप से बहुमूल्य है, यह कि हममें से हर एक को इस दुनिया में किसी खास कारण से और कुछ खास पेशकशों के साथ लाया गया है।” मई में, ट्रम्प प्रशासन ने उन 12 क्षेत्रों को एक-एक करके बताया जिनमें ईरान को प्रगति करनी ही होगी तभी उसके साथ हमारे रिश्तों में कोई बदलाव होगा। इनमें यूरेनियम संवर्द्धन को पूरी तरह से रोकना, अपने परमाणु कार्यक्रम के पूर्व सैन्य आयामों का पूरा ब्योरा देना, बैलिस्टिक मिसाइलों के प्रसार और भड़काऊ मिसाइल लॉन्चों को बंद करना, कैद किए गए अमेरिकी नागरिकों को छोड़ना, आतंकवाद के लिए अपना समर्थन समाप्त करना आदि शामिल हैं।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने साफ कर दिया है कि दबाव केवल तभी बढ़ेगा जब ईरान संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगियों और साझेदारों के मानकों पर खरा नहीं उतरेगा और ईरानी लोग खुद ही ऐसा देखना चाहते हैं। यही वजह है कि वाशिंगटन यह भी मांग कर रहा है कि तेहरान मानवाधिकारों के मसले पर पर्याप्त सुधार करे। जैसा कि राष्ट्रपति ने लगातार कहा है, वह वार्ता के लिए खुले मन से तैयार हैं। लेकिन जैसा कि उत्तरी कोरिया के मामले में है, संयुक्त राज्य अमेरिका अपना दबाव अभियान तब तक जारी रखेगा जब तक कि ईरान अपनी नीतियों में मूर्त और सतत बदलावों नहीं दर्शाएगा। यदि ईरान वैसे बदलाव लाता है, तो एक नए व्यापक समझौते की गुंजाइश काफी बढ़ जाएगी। हमें लगता है कि शासन के साथ एक समझौता संभव है। ऐसे किसी समझौते के अभाव में, ईरान को दुनिया भर में अपनी सारी धृष्टतापूर्ण और हिंसक गतिविधि बहुत महंगी पड़ेगी।

राष्ट्रपति ट्रम्प इस अभियान को अकेले न करने को तरजीह देते हैं; वह अमेरिकी सहयोगियों और भागीदारों को भी इसमें साथ देखना चाहते हैं। दरअसल, अन्य देशों के बीच पहले ही ईरान द्वारा उत्पन्न उस खतरे को लेकर एक साझा समझ है जो उसकी परमाणु आकांक्षाओं से भी परे है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमानुअल मैक्रों ने कहा है, “ईरान के साथ अपनी क्षेत्रीय गतिविधियों और इसके बैलिस्टिक कार्यक्रम पर दृढ़ रहना महत्वपूर्ण है”; ब्रिटिश प्रधान मंत्री थेरेसा मे ने कहा है कि उनकी “उस खतरे के बारे में समझ बिलकुल साफ है जो कि ईरान खाड़ी और व्यापक मध्य पूर्व में पैदा करता है।” ईरानी खतरे के बारे में यह व्यापक आपसी समझ अन्य देशों के लिए ईरान के व्यवहार में बदलाव लाने के वैश्विक प्रयास (एक ऐसा प्रयास जो लगातार और बड़ा होता जा रहा है) में शामिल होने या न होने को लेकर दुविधा में रहने की कोई जगह नहीं छोड़ती है।

नैतिक स्पष्टता की शक्ति

राष्ट्रपति ट्रम्प को कुछ हद तक उतनी ही खतरनाक दुनिया विरासत में मिली है जितनी दूसरे विश्व युद्ध की पूर्व संध्या पर, पहले विश्व युद्ध के ठीक पहले या कि चरम शीत युद्ध के दौरान, जिससे संयुक्त राज्य अमेरिका दो-चार था। लेकिन उत्तर कोरिया पर और अब ईरान पर उनके विध्वंसक साहस ने दिखाया है कि परमाणु अप्रसार और मज़बूत गठबंधन पर ज़ोर देने के साथ दृढ़ विश्वास की स्पष्टता को अपना करके कितनी प्रगति की जा सकती है। राष्ट्रपति ट्रम्प की गैरकानूनी सत्ताओं से टकराने की कार्रवाइयां इस विश्वास से उपजी हैं कि नैतिक टकराव अंततः राजनयिक समझौते की ओर ले जाता है।

पिछली सदी की विदेश नीति की बड़ी विजयों में से एक के लिए यह ब्लूप्रिंट था: शीत युद्ध में अमेरिकी विजय। अपना राष्ट्रपति पद संभालने के पहले हफ्ते में, राष्ट्रपति रीगन ने सोवियत नेताओं का वर्णन करते हुए कहा, “वे केवल उसी नैतिकता को पहचानते हैं जो उनके हित को आगे बढ़ाएंगे, जिसका अर्थ है कि वे कोई भी भी अपराध करने, झूठ बोलने, धोखा देने का अधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हैं।” विदेश नीति विश्लेषकों ने यह मानते हुए उनकी टिप्पणियों को उपहास में उड़ा दिया कि उनकी स्पष्टवादिता शांति की प्रगति में बाधा डालेगी। लेकिन राष्ट्रपति ने सोवियत संघ के साथ बातचीत करने की प्रतिबद्धता पर भी बल दिया था, एक ऐसा तथ्य जिसकी काफी हद तक अनदेखी कर दी गई। राष्ट्रपति रीगन के नैतिक स्पष्टता और कूटनीतिक तीक्ष्णता के संयोजन ने रेकिविक में 1986 की वार्ता के लिए आधार तैयार किया था, और बाद में, खुद सोवियत साम्यवाद के पतन का भी।

जो लोग अभी भी एक ही धार्मिक दृढ़ विश्वास के सामने झुकते हैं कि स्पष्टवादिता वार्ता को बाधित करती है, उन्हें उस प्रभाव को ज़रूर पहचानना चाहिए जो बयानबाजी तथा व्यावहारिक दबाव का गैरकानूनी सत्ताओं पर पर हुआ है और हो रहा है। जिस दर से ईरानी अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही है और विरोध प्रदर्शन तेज़ी से बढ़ रहे हैं, इससे ईरानी नेतृत्व को स्पष्ट हो जाना चाहिए कि आगे बढ़ने का बातचीत सबसे अच्छा तरीका है।


मूल सामग्री देखें: https://www.state.gov/secretary/remarks/2018/10/286751.htm
यह अनुवाद एक शिष्टाचार के रूप में प्रदान किया गया है और केवल मूल अंग्रेजी स्रोत को ही आधिकारिक माना जाना चाहिए।
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